इमाम हुसैन को चेहल्लुम पर अर्पित होंगे खिराजे अकीदत

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परवेज अख्तर/सिवान : कर्बला की जंग में हजरत इमाम हुसैन की शहादत के बाद काफिले में बची औरतें और बीमार लोगों को यजीद की सेना ने गिरफ्तार कर लिया। उनके खेमे टेंट में आग लगा दी गई। बाद मे यजीद के कब्जे वाले काफिले को यजीद ने मदीना जाने की अनुमति दे दी और सैनिकों से इन्हें वापस पहुंचाने को कहा। हजरत जैनुल आबदिन के नेतृत्व में मदीना वापसी के दौरान काफिला कर्बला पहुंचा। सभी ने शोहदा ए कर्बला की कब्र की जियारत (दर्शन) की। यह इमाम हुसैन की शहादत का 40वां दिन था। इसी याद में हजरत इमाम हुसैन की शहादत मुहर्रम की दसवीं तारीख के 40वें दिन को चेहल्लुम मनाया जाता है। इस दिन कर्बला के शहीदों को खिराजे अकीदत (श्रद्धा सुमन) पेश की जाती है। अनुयायी ताजिया जुलूस निकाल मातम करते हुए इमामबाड़ा तक जाते हैं। इराक की राजधानी बगदाद से करीब एक सौ किलो मीटर उत्तर पूर्व दिशा में कर्बला स्थित है। यहां 10 अक्टूबर 680 ई. को एक ऐतिहासिक और धार्मिक युद्ध समाप्त हुई थी। हालांकि यह जंग शुरू होने के कुछ दिनों में ही समाप्त हो गई, लेकिन कर्बला की जंग का गम आज भी उतना ही ताज़ा है जितना 1337 वर्ष पहले था। इस जंग में एक तरफ हजरत इमाम हुसैन और उनके परिवार समेत बच्चे एवं वृद्ध 72 साथी थे, वहीं दूसरी तरफ यजीद की 40 हजार सेना थी।

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इमाम हुसैन के कमांडर अब्बास इब्ने अली थे और यजीदी फौज के कमांडर उमर इब्न सऊद थे। इस जंग में इमाम हुसैन और उनके परिवार के बच्चे, वृद्ध जवान समेत सभी 72 साथी शहीद हो गए, लेकिन सत्य के रास्ते से विचलित नहीं हुए 10 मुहर्रम 61 हिजरी को उनकी शहादत के बाद इमाम हुसैन के बीमार बेटे हजरत इमाम जैनुल आब्दीन बचे, क्योंकि बीमार होने के कारण उन्होंने युद्ध में भाग नहीं लिया था।

सत्य मार्ग से विचलित नहीं हुए हुसैन

मैरवा प्रखंड के शिवपुर मठिया में चेहल्लुम के अवसर पर जलसा का आयोजन कर इमाम हुसैन की शहादत को याद किया गया उनके हक परस्ती के रास्ते पर चलते रहने का संकल्प लिया गया। इस मौके पर मौलाना मो. शमशाद ने कहा कि हजरत इमाम हुसैन और उनके परिवार समेत 72 साथियों ने कर्बला की जंग में हक परस्ती को बचा लिया। वे शहीद हो गए, लेकिन सत्य मार्ग से विचलित नहीं हुए मौलाना चमन कादरी ने कहा कि कर्बला की जंग असल में जाहिरी तौर पर यजीदी फौज की जीत हुई थी, लेकिन सच्चाई तो यह है कि यजीद जंग जीत कर भी हार गया था और इमाम हुसैन शहीद होकर भी जीत गए। मो. मासूम ने मरसिया पढ़कर कर्बला के शहीदों को खिराज-ए-अकीदत पेश किया। इस अवसर पर मौलाना गुड्डू, मो. जावेद, मो. नौशाद, अकबर हुसैन, छोटे मियां, गुलाब सरवर, सोनू अली समेत कई अन्य लोग मौजूद थे।