दिवंगत पूर्व सांसद डॉ. मो. शहाबुद्दीन की हत्या करवाने को कहा था सिवान के जदयू नेता ने, रिटायर आईपीएस ने खोला यह राज

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shabuddin vs Ips sudhir singh
  • सरकार द्वारा दिये जाने वाले तमगे यानी गैलेंट्री के प्रति आसक्ति होती तो,तो हथियार की झूठी बरामदगी और झूठा एनकाउंटर दिखाकर कहानी बुन सकता था
  • भारतीय दण्ड विधान तो वेश्या के साथ भी किये गए अतिचार को बलात्कार और दंडनीय मानता है
  • लालू जी के शासनकाल में भूमिहार अफसरों के विरुद्ध कोल्ड स्टोरेज नीति चलायी गयी थी
  • हुल्लड़बाज थक जाते थे और मेरे सुरक्षाकर्मी सिर्फ लाठी भांजकर उन्हें नियंत्रित करने में सफल हो जाते थे
  • सरकारी कर्मी के द्वारा पहले शहाबुद्दीन के गुर्गों को पान परोसा जाता था,मेरे कार्यकाल में चौकीदार भी शान से घूमते थे
  • आईपीएस के बयान पर राजनीति गरमाने के आसार

✍️परवेज अख्तर/एडिटर इन चीफ
       (7543814786)
बिहार की राजनीति में विकास पुरुष सांसद के रूप में हमेशा डॉ.मो.शहाबुद्दीन की पहचान कायम रही।कहा जाता है कि शहाबुद्दीन सीवान नहीं बल्कि पूरे राज्य में विकास पुरुष के नाम से जाने जाते थे।इसे पक्ष विपक्ष दोनों मानते हैं।भले वह अब दुनिया में नहीं हैं।उस डॉ.मो.शहाबुद्दीन को खत्म करने का तत्कालीन नीतीश सरकार के पार्टी के हीं बाहुबली सांसद ने कहा था।इसका खुलासा एक रिटार्यड आईपीएस ने की है।ये आईपीएस उस समय सीवान जिले में सदर एसडीपीओ के पद पर तैनात थे।मैं यहां बात कर रहा हूं,आईपीएस सुधीर कुमार सिंह की।डीआईजी के पद से सेवानिवृत होने के बाद राजनीति में अब श्री सिंह कदम रख चुके हैं।पिछले चुनाव में सुधीर ने सिवान से अपनी भाग्य भी आजमाया था,पर करारी हार का सामना उन्हें करना पड़ा था।श्री सिंह सोशल मीडिया में हमेशा सक्रिय रहने वाले आईपीएस इस बार अपने ही एक पोस्ट को लेकर चर्चा में हैं।जिसे उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर लिखा है।इनके पोस्ट की एक एक लाईनें बहस तेज करने के लिए हीं काफी है।

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सुधाीर कुमार सिंह ने पहली बार सीवान का एसडीपीओ रहते हुए डॉ.मो़. शहाबुद्दीन को चेतावनी दी थी।सुधीर कुमार सिंह अपने फेसबुक पोस्ट पर लिखते हैं,सिवान जिले में दबंग एसडीपीओ के रूप में रहा 2005 के नवंबर से अप्रैल,2009 तक।मेरी गाड़ी जब सड़कों पर निकलती थी,तब अपराधियों की चीत्कार की आवाज बिहार के विभिन्न जिलों के पुलिस लॉगर पर गूंजने लगती थी।मेरा सबसे महत्वपूर्ण टारगेट डॉ.मो. शहाबुद्दीन था और सरकार उसके विरुद्ध थी।मैं चाहता तो उसकी हत्या करवा सकता था और कहीं से चूँ की आवाज भी नहीं होती।छपरा के एक दबंग सांसद जो संभवतःआज जेल में हैं,उसने मुझसे काफी अनुरोध कर कहा था कि शहाबुद्दीन को खत्म कर दीजिए।मैं सिर्फ हँसता रह गया था,क्योंकि मुझे अहसास था कि मेरा अन्तः मन कभी भी हत्या का आदेश नहीं दे सकता है।यह तो सही है कि राजद के भूमिहार -विरोधी रवैये के कारण मुझे उससे नफरत सी थी और मुझमें एक प्रतिशोध का भाव था,पर मैंने कभी भी उसे सीमा का अतिक्रमण करने नहीं दिया।

रामनगर में शहाबुद्दीन के हीं चेले फखरुद्दीन ने मेरे रामनगर थाना -प्रभारी के सामने कुछ गर्मी दिखाने का प्रयास किया।पूर्व एसडीपीओ श्री अशोक जी के साथ बदतमीजी करने की अफवाह फैली थी।अपहरण की दो घटनाओं में उसकी संलिप्तता की आशंका थी और फिर उसने मेरे शेष कार्यकाल भर रामनगर में कदम नहीं रखा और उसने मैजिस्ट्रेट के यहाँ आवेदन दिया कि एसडीपीओ उसकी जान लेना चाहते हैं।पर ईश्वर गवाह है कि कभी किसी की जान लेने की बात तो मैं सोच भी नहीं सकता था।अपराधी भयभीत होकर अपराध से विराम ले ले -बस,इसे ही मैं वर्दी के कर्त्तव्य की सिद्धि मानता था।पुलिस का चतमेमदबम अंसनम होना चाहिए।हत्या -रक्तपात से अपराध नियंत्रण नहीं होता है।मुझे गर्व है कि मैंने कहीं भी, कभी भी अपने सेवा की क्षेत्र में गोली नहीं चलवाई,पर मुझे खुद आश्चर्य होता था यह देखकर कि अपराधी मेरी छाया से भी डरते थे,जबकि आमलोग मुझसे खुलकर मिलते और बात करते थे।

सिवान में मेरी घोषणा थी कि यदि मेरे किसी सिपाही को भी कोई अपराधी एक चाँटा मार देगा तो मैं नौकरी से रिजाइन कर दूँगा।जिस सिवान में दरोगा और इंस्पेक्टर की हत्या होती रही थी,जहाँ पान की दुकान पर किसी सरकारी कर्मी से पहले शहाबुद्दीन के गुर्गों को पान परोसा जाता था,वहाँ मेरे चौकीदार भी शान से घूमते थे।मैंने कई नक्सलियों को गिरफ्तार किया था,पर सबसे बड़ी सफलता तब मिली जब 72 लाख के इनामी नक्सलियों को पकड़ा।कुल सात नक्सली एक साथ पकड़े गये थे,जिनमें तीन पॉलित ब्यूरो के सदस्य थे।इन पर आंध्र,छत्तीसगढ़,झारखंड और बिहार सरकार द्वारा कुल 72 लाख के पुरस्कार घोषित थे।यदि भारत सरकार द्वारा दिये जाने वाले तमगे यानी गैलेंट्री  के प्रति आसक्ति होती तो,तो हथियार की झूठी बरामदगी और झूठा एनकाउंटर दिखाकर कहानी बुन सकता था।

मैं तो भूमिहार था और नक्सलियों के प्रति मुझमें जातीय आक्रोश भी था,पर ईश्वर साक्षी है कि एक बार भी  मेरे दिमाग में यह नहीं आया कि इनकी हत्या कर अपनी बहादुरी के गीत रचूं। परिणामतः गैलेंट्री तो नहीं ही मिल सकी,पुरस्कार के पैसे भी पता नहीं किस गुप्त खाते में चले गए।काश ! मेरे सर पर भी किसी बड़े ओहदे का वरदहस्त होता।लालू जी के शासनकाल में भूमिहार अफसरों के विरुद्ध कोल्ड स्टोरेज नीति चलायी गयी थी ।अतः मेरी फील्ड पोस्टिंग तो जेडीयू सरकार बनने के हीं बाद ही हो सकी थी और इसके बाद ही मुझे अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिला था।मेरे अन्दर एक तरह का अव्यक्त आक्रोश था राजद के नेताओं के प्रति।लेकिन कहीं भी यह आक्रोश गम्भीरतम से गम्भीरतम  परिस्थितियों में भी हत्या -रक्तपात में नहीं बदल सका।

रात के अँधेरे में दो दो घंटे तक रोड़े बरसाए जाते रहे थे ,मेरे सहयोगी मेरे विरुद्ध तरह तरह की फब्तियाँ कसने लगते थे,पर मैं शांतिपूर्वक बैठा रहता था,ताकि हुल्लड़बाज थक जायें और फिर मेरे सुरक्षाकर्मी सिर्फ लाठी भांजकर उन्हें नियंत्रित करने में सफल हो जायें।छपरा,जमुई,मोतिहारी में एसपी गिरी के दरम्यान कई बार दंगे शुरू हुए,पर मुझे घटनास्थल पर पहुँचने में आधे घंटे से ज्यादा समय नहीं लगा और वगैर गोली – बारी दूध के उफान की तरह दंगे शांत हो गए।मुझे विश्वास हो चला है कि सहरसा में पप्पू देव की हत्या हुई है।यह सही है उसका आपराधिक इतिहास था।लेकिन भारतीय संस्कृति ने तो डकैत रत्नाकर को भी वाल्मीकि बनते देखा है और भारतीय दण्ड विधान तो वेश्या के साथ भी किये गए अतिचार को बलात्कार और दण्डनीय मानता है।सुनते हैं पप्पू देव एक अच्छे इंसान के रूप में जीना चाह रहा था, हालांकि यह भी अफवाह है कि वह ए के 47 जैसे आग्नेयास्त्र इकट्ठा कर रहा था।

लेकिन अफवाह तो अफवाह होती है।बरामदगी या अन्य साक्ष्यों के बिना इसे सच कैसे माना जा सकता है ? फिर भी हत्या को औचित्यपूर्ण कैसे माना जा सकता है ?यदि अपराधी की ओर से चली गोलियों से कोई पुलिसकर्मी घायल हो गया होता,तो फिर मुठभेड़ की कहानी खींच -खाँच कर सही मानी जा सकती थी।खैर,मैं तो नीतीश जी से यही उम्मीद करता हूँ कि वे सारी जानकारियां इकट्ठी कर बयान दें और बताएँ कि पुलिस उनकी निगाह में दोषी या निर्दोष है ताकि विरोधियों का मुँह बन्द हो सके और समर्थक सर उठाकर कह सकें कि यह सुशासन की सरकार है,अन्यथा तो जनता का आक्रोश बढ़ेगा हीं और भूमिहार इसमें अग्रणी भूमिका निभायेंगे।नीतीश जी,आप की लवकुश पार्टी के समानांतर राजद भी है।कहीं ऐसा न हो कि भूमिहार राजद की तरफ मुड़ जायें।

आईपीएस के बयान पर राजनीति गरमाने के आसार

डॉ.मो.शहाबुद्दीन की हत्या करने की बात कहने वाले जिस सांसद की बात आईपीएस सुधीर कुमार सिहं कह रहे हैं,उसमें इनका इशारा शायद एक बाबहुबली सांसद पर है।वे उस समय महाराजगंज से जदयू के सांसद थे। लेकिन फेसबुक पोस्ट से एक बात सामने आती है कि वर्दीवाले सुधीर कुमार सिंह जैसा बहुत सारे लोग हैं,जो एक जाति के घरौंदे से बाहर नहीं निकल पाते हैं।सुधीर कुमार सिंह बार बार अपने को भूमिहार जाति से जोड़कर तमाम बातें करते हैं।जिस पूर्व सांसद की बात की जा रही है, वे कभी नीतीश कुमार के तो कभी लालू प्रसाद के काफी करीबी रहे।इस समय उनके लड़के भी राजद में हैं।अब इस दुनिया में डॉ.मो.शहाबुद्दीन नहीं हैं।उनका कोरोना के दूसरे लहर में निधन हो गया।लेकिन आज भी उनको याद करने वालों की संख्या कम नहीं है।सुधीर कुमार सिंह का शहाबुद्दीन को लेकर दिया गया बयान अगर सही है तो राजद में भूचाल आना स्वाभाविक है।क्योंकि पूर्व सांसद भी अब राजद में हैं।साथ ही शहाबुद्दीन का परिवार भी राजद में है।ऐसे में डॉ.मो.शहाबुद्दीन को चाहने वाले सुधीर कुमार सिंह के बयान को लेकर आहत हैं।दो बाहुबली सांसदों के बीच जुड़ा मामला शायद आगे और गरमा सकता है।