मातृ एवं शिशु मृत्यु की सर्विलांस और रिपोर्टिंग को लेकर एक दिवसीय प्रशिक्षण का आयोजन

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  • मातृ मृत्यु की तरह ही शिशु मृत्यु की सही तरीके से हो रिपोर्टिंग: सिविल सर्जन
  • गर्भवती महिलाओं में खून की कमी के नही होनी चाहिए:
  • आपसी झगड़ा होने के बाद हुई मृत्यु को मातृ मृत्यु नहीं कहा जाता
  • आशा कार्यकर्ताओं को पोषक क्षेत्रों की गर्भवती महिलाओं की जानकारी रखना जरूरी

परवेज अख्तर/सिवान: सदर अस्पताल परिसर स्थित सभागार में शुक्रवार को मातृ एवं शिशु मृत्यु को लेकर एक दिवसीय प्रशिक्षण का आयोजन किया गया। इस अवसर पर पटना से प्रशिक्षण देने आये केयर इंडिया की ओर से डॉ प्रमोद एवं पिरामल फाउंडेशन की ओर से सुमित कुमार के द्वारा प्रशिक्षण दिया गया। इस दौरान देश व राज्य में मातृ मृत्यु के मामलें को लेकर विस्तृत रूप से चर्चा की गई। सिविल सर्जन डॉ यदुवंश कुमार शर्मा द्वारा गर्भावस्था से लेकर प्रसव के 42 दिन के अंदर महिलाओं की मृत्यु से संबंधित विभिन्न तरह के आंकड़े व जानकारी दी गई। वहीं उन्होंने मृत्यु के प्रमुख कारणों एवं निदान को लेकर विभिन्न तरह के उपायों पर भी प्रकाश डाला।

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मातृ मृत्यु की तरह ही शिशु मृत्यु की सही तरीके से हो रिपोर्टिंग: सिविल सर्जन

सिविल सर्जन डॉ यदुवंश कुमार शर्मा ने कहा गर्भवती महिलाओं की प्रसव पूर्व जांच यानी एएनसी बहुत ही जरूरी है। इस अवधि में प्रत्येक तीन महीने पर एक बार एएनसी सुरक्षित प्रसव के लिए जरूरी होता है। उपस्थित चिकित्सकों से कहा कि आपलोग गर्भवती महिलाओं की जांच करते समय स्टेथोस्कोप जरूर लगाएं। इस से कई तरह की बीमारियों की जानकारी आसानी से लग जाती है। क्योंकि मातृ मृत्यु के एक प्रमुख कारण जॉन्डिस, चीनी रोग, हृदय रोग, खून की कमी आदि पूर्व से चली आ रही बीमारियों में से एक हैं। सीएस ने बताया किसी भी नवजात शिशुओं के लिए उसका पहला दिन सबसे अधिक जोखिम भरा होता है। नवजात शिशुओं की मृत्यु के होने के मुख्यतः तीन मुख्य कारण सामने आते हैं। जिनमें सबसे पहला, समय के पूर्व शिशु का जन्म होना, दूसरा, एस्फ़िक्सिया यानि सांस का नही लेना, जबकिं तीसरा, इंफ़ेक्शन जैसे: सैप्सिज़ और निमोनिया के कारण नवजात शिशुओं की मृत्यु जन्म के बाद हो जाती हैं। आशा कार्यकर्ताओं के द्वारा मातृ एवं शिशु मृत्यु की सूचना देने के एवज में प्रोत्साहन राशि भी दी जाती हैं। मातृ मृत्यु की तरह ही शिशु मृत्यु की सही तरीके से रिपोर्टिंग हो। इसके लिए स्थानीय पीएचसी स्तर से लेकर जिला स्तर के स्वास्थ्य केंद्रों द्वारा शत प्रतिशत रिपोर्टिंग होनी चाहिए ताकि यह पता चल सके कि हमलोगों द्वारा कितना प्रयास किया गया हैं।

गर्भवती महिलाओं में खून की कमी के नही होनी चाहिए: डॉ प्रमोद

केयर इंडिया की ओर से प्रशिक्षण देने आये डॉ प्रमोद ने कहा हालांकि 90 के दशक के मुकाबले देश में मातृ मृत्यु में काफी कमी आयी हुई है। फिलहाल एक लाख महिलाओं में औसतन 149 की मौत प्रसव के दौरान हो रही है। इस संख्या पर विस्तार से चर्चा करते हुए उन्होंने बताया अब भी गर्भधारण से लेकर प्रसव के बाद 42 दिनों के अंदर होने वाली मृत्यु की संख्या-44 हजार प्रति वर्ष है। उन्होंने यह भी बताया कि देश के जिन पांच से छह राज्यों में मातृ मृत्यु सबसे अधिक है, उसमें बिहार भी शामिल है। जबकिं असम, राजस्थान, मध्यप्रदेश, बिहार और यूपी देश के ऐसे राज्य हैं जिनका योगदान इस तरह की मृत्यु में सबसे अधिक है। उन्होंने यह भी कहा कि मातृ मृत्यु के प्रमुख कारणों में खून की कमी एक बड़ा कारण है। सही ढंग से एएनसी नहीं होना और अधिक बच्चे होना भी मुख्य कारणों में शामिल हैं। मातृ मृत्यु के मामलों को किसी स्तर पर भी छुपाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। क्योंकि उसके बाद ही मृत्यु के कारणों का विश्लेषण कर उसे कम करने के उपायों पर काम करना संभव हो सकता है।जिले में संचालित हेल्थ एंड वेलनेस सेंटरों की उपलब्धि की भी जानकारी दी गई।

आपसी झगड़ा होने के बाद हुई मृत्यु को मातृ मृत्यु नहीं कहा जाता: डॉ प्रमोद

प्रशिक्षण के दौरान केयर इंडिया के डॉ प्रमोद ने कहा कि अब केवल मातृ मृत्यु की समीक्षा से काम चलने वाला नहीं है। बिहार सरकार इस विषय पर पहले से ज्यादा गंभीर हो गई है। मातृ मृत्यु को कम करने के लिए अब एमडीएसआर यानी मैटरनल डेथ सेरवेलेन्स एंड रिस्पांस की प्रक्रिया अपनाई जा रही है। इस पर विस्तृत रूप से चर्चा करते हुए कहा की यह मातृ मृत्यु की पहचान, जानकारी और समीक्षा करने का चक्र है। इसके माध्यम से गर्भवाती महिलाओं की देखभाल की गुणवत्ता में आवश्यक सुधार कर मातृ मृत्यु को रोका जा सकता है। मातृ मृत्यु को परिभाषित करते हुए बताया कि यह केवल गर्भधारण से लेकर प्रसव के 42 दिन के अंदर हुई मृत्यु ही मातृ मृत्यु की परिभाषा नहीं है। बल्कि उस महिला की मृत्यु प्रसव से संबंधित जटिलताओं एवं उसके प्रबंधन में चूक से हुई है या नहीं। उन्होंने कहा कि अगर मृत्यु दुर्घटना या लड़ाई झगड़े आदि घटनाओं के कारण हुई हैं तो इसे मातृ मृत्यु नहीं कहा जाता हैं। उन्होंने यह भी बताया मातृ मृत्यु की सही रिपोर्ट का होना जरूरी होता है। जिसे किसी भी कीमत पर छिपाना नहीं चाहिए। और ना ही मातृ मृत्यु के लिए किसी व्यक्ति विशेष को दोषी ठहराते हुए उसे दंडनीय कार्रवाई होनी चाहिए। बल्कि इसके कारणों का विश्लेषण कर सुधार करना जरूरी है।

आशा कार्यकर्ताओं को पोषक क्षेत्रों की गर्भवती महिलाओं की जानकारी रखना जरूरी: सुमित कुमार

पिरामल फाउंडेशन की ओर से आये सुमित कुमार ने बताया आशा कार्यकर्ताओं को यह बताना जरूरी है कि वे अपने पोषक क्षेत्रों की गर्भवती महिलाओं की जानकारी रखना बहुत ही ज्यादा जरूरी होता हैं। इसके साथ ही गर्भावस्था के दौरान या प्रसव के तुरंत बाद धात्री महिलाएं किसी और जगह चली जाती है तो भी इसकी जानकारी होनी चाहिए। ताकि स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी उस महिला की खोजबीन कर उसे आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करा सकें। आशा कार्यकर्ताओं के अलावा भी सामुदायिक स्तर पर कोई अन्य सदस्य अपने क्षेत्र में होने वाली मातृ मृत्यु की जानकारी 104 नम्बर पर डायल कर इसकी जानकारी दी जा सकती हैं। जांच के बाद मामले की पुष्टि होने पर प्रोत्साहन राशि देने का भी प्रावधान है।सिविल सर्जन डॉ यदुवंश कुमार शर्मा, जिला स्वास्थ्य समिति के जिला कार्यक्रम प्रबंधक ठाकुर विश्वमोहन, सदर अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ रीता सिन्हा, डॉ सुनील कुमार सिंह, एसएनसीयू के प्रभारी डॉ महमद इसराइल, डीपीसी इमामुल होदा, केयर इंडिया की ओर से आनंद कुमार सिन्हा, डॉ संगीता कुमारी, डॉ सरिता सहित ज़िलें के सभी स्वास्थ्य केंद्रों से आये चिकित्सा पदाधिकारी उपस्थित थे।