हुसैनगंज के जमालहाता के कारीगरों के बनाए वस्त्रों को पहनते थे राजेन्द्र बाबू

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  • राजेन्द्र बाबू को हस्तकरघा वस्त्र से था अगाध लगाव व प्रेम
  • जमालहाता के कारीगरों के बनाए वस्त्रों को पहनते थे
  • जमालहाता जाकर हस्तकरघा बुनकरों का बढ़ाया हौसला

परवेज़ अख्तर/हुसैनगंज/सीवान:
भारतीय वस्त्र के इतिहास में हस्तकरघा वस्त्र का अपना विशेष महत्व रहा है। यह महत्व सर्वथा एतिहासिक कहा जा सकता है। देश की आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी ने खादी के महत्व को जानकर उसे स्वराज से जोड़ा था। तत्कालीन परिवेश चरखा-करघा विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। महात्मा गांधी ने इसे स्वयं अपनाया था। इसी से खादी के महत्व को आंका जा सकता है। स्वराज का प्रश्न बनी खादी व खादी वस्त्रों में हथकरघा उसका अनिवार्य अभिन्न अंग बना। हस्तकरघा वस्त्र एक सशक्त हथियार स्वराज के लिए बन गया। स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद भी हस्तकरघा के वस्त्र को ही पसंद करते थे। वेर्स्टन पोशाक की जगह हस्तकरघा वस्त्र के प्रति उनका अगाध लगाव था। महात्मा गांधी के नेतृत्व में आजादी की लड़ाई लड़ने वाले राजेन्द्र बाबू का हस्तकरघा के प्रति अगाध लगाव व प्रेम का ही परिणाम था कि बिहार के सीवान जिला स्थित जमालहाता बुनकरों के बीच पहुंच गए।

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राजेन्द्र बाबू रंग-बिरंगे धागों से निर्मित वस्त्रों को देखने के बाद प्रसन्नचित हो उठे। हस्तकरघा उद्योग से जुड़े कर्मियों की हौसला अफजाई करते हुए वस्त्रों को खरीदे भी। प्रो. तौहिद अंसारी ने बताया कि राष्ट्रपति बनने के बाद भी राजेन्द्र बाबू हस्तकरघा वस्त्र को नहीं भूले। उनकी पसंद के वस्त्र जमालहाता के विशेष कारीगरों द्वारा बनाए गए होते थे, जिसे वह बड़े चाव से पहनते थे। राष्ट्रपति बनने के बाद इस उद्योग के विकास व समृद्धि के लिए राजेन्द्र बाबू ने मोबाइल वैन मुहैया कराई थी। गाड़ी खराब होने पर पैसा भी राष्ट्रपति भवन से भेजते थे। बाबू ने उद्यमियों से कहा था कि सिर और कंधे पर रखकर वस्त्र नहीं बेचें। अजीम शखिसयत के धनी राजेन्द्र बाबू हस्तकरघा वस्त्र के महत्व को समझते थे। इस व्यवसाय से जुड़े लोगों के दुख-दर्द को समझे।

बापू के जीरादेई आने पर दिया हस्तकरघा वस्त्र

स्वतंत्रता सेनानी के रूप में राजेन्द्र बाबू हस्तकरघा के महत्व को समझ चुके थे। सीवान सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक के निदेशक प्रो. तोहिद अंसारी ने बताया कि 1942 में महात्मा गांधी जीरादेई आए तो राजेन्द्र बाबू ने जमालहाता के विशेष बुनकरों के बनाए गए कपड़े को बापू को दिया था। हस्तकरघा वस्त्र को स्वीकार करते हुए बापू ने कहा था कि जब-तक देशवासियों के शरीर पर वस्त्र नहीं हो जाता ऐसा ही वस्त्र धारण करता रहूंगा।