रोजा का मतलब तमाम बुराइयों से परहेज : मौलाना साबेरूल कादरी

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maulana Saberul Qadri

कुरान के दूसरे पारे के आयत नंबर 183 में रोजा रखना हर मुसलमान के लिए जरूरी

परवेज अख्तर/सिवान : मुफ्फसिल थाना क्षेत्र के टरवां स्थित मदरसा अहले सुन्नत गरीब नवाज के प्रधानाध्यापक सह मदीना मस्जिद के खतिबो इमाम मौलाना साबेरूल कादरी ने रमजानुल मुबारक पर फजीलत बयान करते हुए कहा कि मुसलमानों के लिए पांच चीजें सबसे जरूरी हैं जिनमें पहला इमान, दूसरा नमाज, तीसरा रोजा, चौथा हज और पांचवां जकात है। इस्लाम में बताए गए इन पांच कर्तव्य को मानने वाला इंसान अगर इसी वसूल पर चले तो उसे इंसान से प्रेम, सहानुभूति, सहायता तथा हमदर्दी की प्रेरणा स्वतः पैदा हो जाती है। उन्होंने आगे बताया कि रमजान में रोजे को अरबी में सोम कहते हैं, जिसका मतलब होता है रुकना। रोजा यानी तमाम बुराइयों से परहेज करना। रोजे के दौरान अगर किसी जगह दूसरे की बुराई, हिनाई या शिकायत भरी बातें की जाती हो तो रोजेदार को उनकी अनदेखी कर उससे तौबा करनी चाहिए वहां से मुंह फेर कर आगे बढ़ना चाहिए। जब मुसलमान रोजा रखता है, उसके हृदय में भूखे व्यक्ति के लिए हमदर्दी आपने आप पैदा होती है। रमजान के महीने में सवाब को सत्तर गुना बढ़ा दिया जाता है। जकात इसी महीने में अदा की जाती है। रोजा झूठ, हिंसा, बुराई, रिश्वत तथा अन्य तमाम गलत कामों से बचने की प्रेरणा देता है। इसका अभ्यास पूरे एक महीना कराया जाता है ताकि इंसान पूरे साल तमाम बुराइयों से बचें। कुरान में अल्लाह ने फरमाया कि रोजा ने तुम्हारे ऊपर इसलिए फर्ज किया है, ताकि तुम खुदा से डरने वाले बनो। खुदा से डरने का मतलब यह है कि इंसान अपने अंदर विनम्रता तथा कोमलता पैदा करना?

रमजान महीने के हैं तीन हिस्से

रमजान इस्लामी महीने का नौवां महीना है। इसका नाम भी इस्लामिक कैलेंडर के नौवें महीने से बना है। यह महीना इस्लाम के सबसे पाक महीनों में शुमार किया जाता है। रमजान के महीने को तीन हिस्सों में बांटा गया है। हर हिस्से में दस-दस दिन आते हैं। हर दस दिन के हिस्से को अशरा कहते हैं जिसका मतलब अरबी में10 है। कुरान पाक के दूसरे पारे के आयत नंबर 183 में रोजा रखना हर मुसलमान के लिए जरूरी बताया गया है।[sg_popup id=”5″ event=”onload”][/sg_popup]

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