महीनों के लॉकडाउन के बाद पर्यावरण में कई सकारात्मक बदलाव दृष्टिगोचर

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प्रातः होते हीं सुनने को मिल रही है कई लुप्तप्रायः पक्षियों की चहचआहट

परवेज अख्तर/सिवान:-कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के संक्रमण की रोक थाम के लिए सरकार द्वारा लागू लॉक डाउन के एक महीना पूरा होने के बाद जहाँ एक तरफ पूरी दुनिया अकस्मात थम सी गई है वहीं वातावरण में कई अमूलभुत सकारात्मक बदलाव भी प्रत्यक्ष नजर आने लगा है।आज की प्रतिस्पर्धा और आपाधापी से भरी रफ्तार से भागती जिंदगियों में लोगों को एक पल के लिए भी सुकून से जीना मुहाल हो गया है।

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परिणाम स्वरूप लोगों का उच्चरक्तचाप, उन्माद और हृदय घात जैसी घातक बीमारियों का शिकार होना आम बात हो गया है।और हो भी क्यों नहीं एकतरफ जहाँ कल कारखानो और इट भट्ठों से उत्सर्जित जहरीले रसायनों और धुल भरी हवाओं में सांस लेने की मजबूरी और दूसरी तरफ पारिवारिक और सामाजिक समस्याओं का अंबार लोगों को चैन से जीने ही कहाँ देती।लोगों का मानना है कि घोषित लॉक डाउन से विकास की रफ्तार पर अचानक ब्रेक लगने के कारण आर्थिक मंदी जरूर आई है लेकिन अब लोग अमन चैन और शांति महसूश करने लगे हैं।

वीरान सड़कों के किनारे लगे झाड़ में नव पल्लवित गुछों में खिले हुए महकते पुष्प पर चहकती पंछियों के कलरव और गेहूं कटे सरेह में नीलगायों की क्रीड़ा करती झुंड इस बात के प्रत्यक्ष गवाह बन रहीं हैं।गुठनी के आस पास के गांवों जैसे बलुआ, तिरबलुआ और मैरिटार जो गंडक और सरयू नदी के किनारे बसे है के लोग अपनी गृहस्ती के कई महत्वपूर्ण कार्यों के लिए नदियों के जल पर निर्भर रहते हैं।इन गांवों के निवासियों ने बताया कि स्वास्थ्य की दृष्टिकोण से लोगों के लिए लॉक डाउन बहुत हीं कारगर सिद्ध हो रहा है।

निदियों के जल में निर्मलता के साथ स्वाद में भी मिठास बढ़ रहा है।यानी जल सुद्धिकरण के लिए सरकारी स्तर पर लाई गई कई महत्वाकांक्षी परियोजनाओं के बाद भी नदियों के जल का प्रदूषण स्तर जितना कम नही हुवा मात्र महीनों के लॉक डाउन के बाद वह बदलाव प्रत्यक्ष नजर आने लगा है।