……..और जब अपने जिंदगी के पीछे एक ऐसी मिसाल छोड़ गए चंदा बाबू

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  • अत्याचार के विरुद्ध जंग जीतकर, जीवन की जंग बुधवार की रात्रि हार गए चंदा बाबू
  • धरोहर के रूप में बचा है विकलांग पुत्र

परवेज़ अख्तर/सिवान:
दहशत व कुछ भी अनहोनी होने की आशंका के बीच अत्याचार के विरुद्ध जंग लड़ने वाले एक साधारण व्यवसाई चंदा बाबू अंततः अपनी जीवन की जंग को हार गए।इसके बावजूद वे अपने पीछे एक ऐसी मिसाल छोड़ गए।जो यह बयां करती है कि अदम्य साहस हो तो हर दर्द का इलाज संभव है।शहर के गौशाला रोड स्थित एक साधारण व्यवसाई चंद्र केश्वर प्रसाद और चंदा बाबू के घर खुशहाली का माहौल वर्ष 2004 के स्वतंत्रता दिवस के पूर्व तक सामान्य था।दो भाई में छोटे भाई चंदा बाबू सिवान रहकर अपने व्यवसाय संभालते थे।जबकि एक भाई पटना में अधिकारी थे।चंदा बाबू का एक भरा पूरा परिवार था।पढ़ी-लिखी पत्नी और 4 बच्चे थे।3 बच्चे अलग-अलग दुकानों पर अपना व्यवसाय संभाल रहे थे।जबकि एक बच्चा विकलांग होने की वजह से उन दोनों के साथ रहता था।

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वर्ष 2004 में स्थिति तब बिगड़ी जब चंदा बाबू ने गौशाला रोड स्थित अपनी पुरानी आवास को नया रूप देना शुरू किया और उसमें एक छोटी सी कोटरी पर अनाधिकृत रूप से एक व्यक्ति ने गुमटी रखकर अपना दुकान चलाना आरंभ कर दिया। प्रारंभ में तो वह गुमटी एक दिखावे की थी लेकिन जैसे ही निर्माण कार्य पूरा होने को था तो उस दुकानदार ने उस दुकान पर अपना कब्जा बनाना चाहा।इसी को लेकर पंचायती आरंभ हुई और 16 अगस्त 2004 को कुछ बाहरी तत्वों के दबाव बनाने पर चंद्र केश्वर बाबू उर्फ चंदा बाबू के परिवार और बाहरी आगंतुकों के बीच झड़प हो गई।जान बचाने के उद्देश्य से चंदा बाबू के परिवार वालों ने कारोबार के उद्देश्य से रखे गए तेजाब को फेंक कर अपनी जान बचाई।जिसमें बाहरी तत्वों के दो लोग गंभीर रूप से जख्मी हो गए।परिणाम स्वरूप प्रतिरोध के रूप में चंदा बाबू के दो पुत्रों को शहर के विभिन्न विभिन्न दुकानों से अपहरण कर लिया गया।

मां कलावती देवी ने अपने दो बच्चों के अपहरण को लेकर मुफस्सिल थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई।प्राथमिकी दर्ज होने के पश्चात भी दोनों बच्चे प्राप्त नहीं हुए और अपहरण को लेकर मामला न्यायालय में स्थानांतरित हो गया। चंदा बाबू पर कई प्रकार का दबाव बनाया गया था कि मुकदमे को उठा लिया जाए।लेकिन चंदा बाबू का साहस ही था कि मामला तेजाब कांड के रूप में चर्चित हो गया।अपहृत  दो लड़कों के साथ बड़ा लड़का राजीव रोशन उर्फ राजेश भी उसी समय से लापता था। लेकिन अचानक से वह 2015 में ऊपर हो आया और न्यायालय में आकर पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन के विरुद्ध उसने गवाही दी और मामला अपहरण से हत्या   के रूप में स्थानांतरित हो गया।अंततः तेजाब हत्याकांड की सुनवाई हुई और पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन सहित अन्य तीन  को आजीवन कारावास की सजा विशेष अदालत द्वारा दी गई।

मामले के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील हुआ तदनुसार उच्चतम न्यायालय तक मामला गया और उच्चतम न्यायालय ने निचली अदालत की सजा को कंफर्म करते हुए मोहम्मद शहाबुद्दीन को तिहाड़ जेल तक पहुंचा दिया। हालांकि कुछ समय पश्चात राजीव रोशन की भी हत्या कर दी गई।जिसका मामला न्यायालय में अभी लंबित है।चंद्र केश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू का जंग अभी यहीं समाप्त नहीं हुआ था।बल्कि तेजाब कांड में मरे अपने बच्चों के विरुद्ध अन्य आठ अभियुक्तों के लंबित मामले में भी उनकी गवाही हो गई थी।

जो एडीजे वन के न्यायालय में लंबित है।राजीव रोशन के हत्यारों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज थी।वह मामला भी ट्रायल के स्तर पर था।यह दो महत्वपूर्ण मामले भी उनके लड़ाई के अंग थे।किंतु इंसाफ की लड़ाई लड़ते-लड़ते वह मानसिक रूप से भी कमजोर हो गए थे और उम्र ने शरीर का साथ देना छोड़ दिया था।अंततः वे जीवन की जंग के आगे अपनी हार मानते हुए अंतिम विदा बुधवार की रात्रि ले ली।उनके परिवार में मात्र अब एक विकलांग बचा बचा है जो उनकी धरोहर के रूप में है।