गोरेयाकोठी: मुहर्रम का महीना शुरू होते ही आंखों के सामने आने लगता है कर्बला का मंजर

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  • यजीद ने इमाम हुसैन को दिया था धोखा
  • इमाम हुसैन की बहादुरी रहेगी हमेशा याद

परवेज अख्तर/सिवान: मुहर्रम की कहानी बयां करते हुए मुस्तफाबाद जामा मस्जिद के इमाम मौलाना मो. मुस्तकीम ने बताया कि जब भी मुहर्रम का महीना आता है इमाम हुसैन के साथ पूरे कुनबे को मैदान ए कर्बला में भूखे प्यासे शहीद होने का मंजर आंखों के सामने आने लगता है। यह जंग दुनिया की सबसे बड़ी जंग थी। जिसमें इमाम हुसैन व उनके पूरे परिवार ने नाना मोहम्मद सल्ला. अलेह वसल्लम के मजहब पर कोई आंच आने नहीं दिया। वहीं यजीद जो मोहम्मद साहब से खानदानी अदावत की वजह से उन के नवासे इमाम हुसैन के पूरे खानदान को खत्म कर देने का कसम खा रखा था। यजीद ने भी अपने जुल्म के सारे हदों को पार कर लिया था। ऐसी की इंसानियत कांप उठे। यजीद ने इमाम हुसैन को कुफा वालों से सैकड़ों खत लिखवा कर भिजवाया कि आप कुफा आ जाएं सारे मुसलमान आपके साथ बैत होकर आपके नाना जान के मजहब को अपनाना चाहते हैं।

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इमामे हुसैन यजीद के षड्यंत्र के शिकार हो गए और उस खत पर भरोसा कर लिए। हालांकि इमाम हुसैन साहब के जाने से पहले उनके भाई मोहम्मद मुस्लिम अपने दो बेटों के साथ कुफा वालों का व्यवहार का जायजा लेने चले गए लेकिन कुफा पहुंचते ही मोहम्मद मुस्लिम व उनके दो बेटों को यजीद के फौजियों ने कत्ल कर दिया। आखिर में इमामे हुसैन ने सिमरे लइन से कहा कि मुझे कुछ लम्हा छोड़ दो ताकि मैं अपने रब की इबादत कर सकूं। लेकिन फौजी सिमर ने कोई मोहलत नहीं दी। इमाम हुसैन मैदान ए कर्बला में अल्लाह के हुजूर में सजदे में ज्योंही गए कि सिमरे ने इमाम हुसैन का सिर धड़ से अलग कर दिया। इमाम हुसैन इस प्रकार मैदान ए कर्बला में शहीद हो गए। यजीदी फौज ने इमाम हुसैन के खानदान को व इमाम हुसैन को खत्म तो कर दिया लेकिन लेकिन पूरी दुनिया में नफरत का केंद्र यजीद बन गया। जबतक दुनिया रहेगी इमाम हुसैन की बहादुरी याद की जाएगी।