महाराजगंज: मुहर्रम के लिए मिट्टी लाने की रस्म शांति से हुई पूरी

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परवेज अख्तर/सिवान: कर्बला के मैदान में हजरत इमाम हुसैन व उनके 72 जानिसारों की शहादत की याद में मनाए जानेवाले मुहर्रम को लेकर मिट्टी लाने की रस्म गुरुवार कि रात शांतिपूर्वक पूरी की गयी. मुहर्रम की पांचवीं तारीख को मिट्टी लाने की रस्म अकीदतमंदों की टोली द्वारा कि गई. शहर के विभिन्न मोहल्ले के मुसलमान भाइयों ने विभिन्न कर्बला से मिट्टी लाने की रस्म पूरी की गई. ढोल ताशे के साथ शहर के मोहन बाजार, कपीया निजामत, काजी बाजार, पुरानी बाजार, पसनौली, इन्दौली, बंगरा आदि इमामबाड़ों से जुड़े लोग मिट्टी लाने गये थे. इस संबंध मे अरमान अली,सेराज अहमद, अफरोज अनवर, उम्मत मियां व मुराद अहमद ने बताया कि मुहर्रम की पांचवीं तारीख को मिट्टी लाने की रस्म की जाती है. इसलिए मुहर्रम मे ताजिया निर्माण के लिए मिट्टी लाने का रस्म काफी महत्वपूर्ण है. विभिन्न ताजियादारों द्वारा शांतिपूर्ण तरीके से मिट्टी लाने का दस्तूर निभाया गया. मिट्टी लाने के रस्म को लेकर स्थानीय प्रशासन द्वारा सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किये गये थे. इस संबंध मे थानाध्यक्ष रणधीर कुमार ने बताया कि मुहर्रम पर्व को लेकर विभिन्न मुहल्ले के ताजियादारों द्वारा मिट्टी लाने का रस्म शांतिपूर्ण पुरा किया गया. गौरतलब है कि दास्ताने मुहर्रम समाज के लिए प्रेरणादायी है. मुहर्रम से पैगाम ए हक का संदेश मिलता है. इंसानियत की आवाज बुलंद करने, दिलों में हमदर्दी एवं मुहब्बत करना सिखाता है. अजीजीया असरफीया मदरसा के सचिव शमसुद्दीन अहमद ने बताया कि इराक में मजीद नामक बादशाह के जुल्म को मिटाने के लिए हुसैन ने कर्बला के मैदान में अपनी शहादत दी थी. इस लड़ाई में हुसैन के खानदान के 72 लोगों ने जुल्म के खिलाफ शहीदों की सूची में अपना नाम लिखवाया था.उन्होंने ने कहा कि मुहर्रम इस्लामिक कैलेंडर का पहला महीना होता है. इस महीने की 10वीं तारीख को इस्लाम के अनुनायी रंज और गम के तौर पर मुहर्रम मनाते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि आज से करीब 1338 साल पहले मुहर्रम की इसी तारीख को पैगम्बर मोहम्मद के नवासे हजरत हुसैन को कत्ल किया गया था. इराक की राजधानी बगदाद से करीब 120 किलोमीटर दूर कर्बला नाम की एक जगह है, जहां की मिट्टी गवाह है इस्लामिक तारीख की उस सबसे बड़ी जंग की, जिसमें जुल्म की इंतेहा हो गई. यजीद ऐसा पत्थर दिल इंसान था जिसने छह महीने के अली असगर को पानी तक नहीं पीने दिया. इसलिए मुसलमान इस दिन पैगंबर की आज्ञा का पालन करने के लिए एक स्वैच्छिक उपवास का पालन करते हैं. मोहर्रम की 10वीं तारीख जब पैगंबर मुहम्मद के पोते, इमाम हुसैन और उनके छोटे बेटे को कर्बला की लड़ाई में काफीरों द्वारा बेरहमी से मार डाला गया था. मुहर्रम की आज छह तारीख है। 9 अगस्त को दसवीं होगी.

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क्यों मनाया जाता है मुहर्रम ?

मुस्लिम मान्यताओं के हिसाब से मोहर्रम गम का महीना है. इस महीने में पैगंबर हजरत मोहम्मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन अपने 72 साथियों के साथ शहीद कर दिए गए थे. इसलिए इस महीने में गम मनाया जाता है. मोहर्रम का चांद जैसे ही नजर आता है, अजादार अपने इमाम के गम में गमजदा हो जाते हैं. इस्लाम धर्म की मान्यता है कि इस दिन कर्बला के मैदान में हजरत इमाम हुसैन और उनके 72 जानिसारों के साथ शहादत को याद किया जाता है.

मकबरों के प्रतिरूप होते हैं ताजिया

शहादत की याद में मुहर्रम पर ताजिया निकाला जाता है. यह ताजिया पैगंबर मोहम्मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन और हजरत इमाम हसन के मकबरों का प्रतिरूप होते हैं. कहते हैं कि हजरत अली के दो वंशज थे, हजरत इमाम हुसैन और हजरत इमाम हसन, हुसैन उस साम्राज्य के हिस्से के शासक थे, जिसे आज ईरान के नाम से जाना जाता है. आधुनिक इराक में दूसरे भाग पर उमय्यादों का शासन था.

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