सुझाव: कौन हारा, कौन जीता के राजनीति चक्कर में आपसी संबंध खराब न करें

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  • दोस्ती के मध्य विचारधारा और पार्टियों को कदापि न आने दें।
  • मुसीबत में केवल मित्र,पड़ोसी ही काम देते हैं नेता नही !

परवेज़ अख्तर/सिवान
मुसीबत में केवल मित्र,पड़ोसी ही काम देते हैं नेता नही ! इसलिए राजनीति में कौन जीत रहा है कौन हार रहा है इस पर बहस करके अपना संबंध न बिगाड़ें।प्यारे दोस्तों राजनीति के चक्कर में आपसी संबंध बिल्कुल बर्बाद न करें,आज की कट्टर राजनीति के परिणाम कल को हमारे संबंधों पर गहरा असर डाल सकता है।अगर आपका कोई साथी आपसे अलग विचारधारा ,अलग तर्कशीलता रखता है तो इसका मतलब ये कतई नही है कि वो देशद्रोही है और राष्ट्र विरोधी विचारधारा रखता है। सरदार भगत सिंह कम्यूनिस्ट विचारधारा रखते थे, बिस्मिल आर्यसमाज से प्रभावित थे,नेहरू जी प्रजातंत्र में आस्था वाले थे ,राजगुरु समाजवादी विचारधारा के पक्षधर थे तो भीमराव अम्बेडकर जातिवाद का खात्मा कर समानता में विश्वास रखते थे ,लेकिन सभी में एक बात कॉमन थी वो तो इनकी देशभक्ति। ये भारत के लिए दिलो जान से मरते थे और हम सभी भारतीय इन देशभक्तों को मानते हैं।

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जिस तरह से हाथों की पांच उंगलिया अलग होती है,उसी तरह से इंसान बना है सबके गुण अपने आप में अलग हैं। तो इसी प्रकार से विचारधारा भी होती है कोई बीजेपी को सपोर्ट करता है तो कोई कांग्रेस को तो किसी की पार्टियां बसपा ,राजद, सपा ,आप,रालोद ,माकपा ,तृणमूल कांग्रेस , लोजपा, अकाली दल या अन्य दल हो सकते हैं और सबकी विचारधाराएं भी अलग हो सकती है।जिसका मतलब ये जरा भी नही है कि वे भारत के झंडे के नीचे नहीं झुकते, राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत नही गाते।वे सभी भारतीय है बस विचारधाराएं अलग है और उनकी रग रग में भारत देश बसता है, इस बात की समझ सभी को आनी जरुरी है।

जब किसी को खून की जरुरत होती है तो वहाँ कोई पार्टी का आदमी नही जाता, वहां एक मित्र जाता है जिसके लिए धर्म, जाति ,पार्टी कोई मायने नही रखती तो इसी प्रकार के संबंध जरुरी है जो दोस्ती के मध्य विचारधारा और पार्टियों को कदापि न आने दें। सभी को समझने की जरुरत है की जो आपको खून दे सकता है और आने वाले कल का साथी हो तो उससे वोट में कौन पार्टी जीत रही है के नाम पर लंबी चौड़ी बहस न करें। हो सकता है आप बड़ी-बड़ी बातें करके तर्क तो जीत जाएं पर संबंध हमेशा के लिए हार जाएं।

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