वेबिनार: निमोनिया की सही समय पर पहचान होने से बच्चे रहेंगे सुरक्षित: कार्यपालक निदेशक

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  • राज्य स्वास्थ्य समिति द्वारा यूनिसेफ के सहयोग से वेबिनार का हुआ आयोजन
  • विश्व निमोनिया दिवस के मौके पर निमोनिया से बचाव की दी गयी जानकारी
  • पाँच साल तक के बच्चों में होने वाली 14 से 15% मौतें निमोनिया के कारण

छपरा: बच्चों एवं माताओं के बेहतर स्वास्थ्य के लिए कई पहल किए गए हैं. संस्थागत प्रसव एवं यूनिवर्सल टीकाकरण कार्यक्रम जैसे कई स्वास्थ्य कार्यक्रम मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य की बुनियाद को मजबूत कर रहे हैं. प्रत्येक साल 12 नवंबर को विश्व निमोनिया दिवस मनाया जाता है. इसके पीछे निमोनिया को लेकर सामुदायिक जागरूकता बढ़ाना है. निमोनिया की सही समय पर पहचान होने से शिशुओं को बेहतर ईलाज प्राप्त होने में देरी हो जाती है, जो बच्चों के लिए जानलेवा भी साबित हो जाता है. निमोनिया के लक्षणों की सही समय पर पहचान होने से निमोनिया के कारण बच्चों में होने वाली मौतों में कमी लायी जा सकती है. उक्त बातें राज्य स्वास्थ्य समिति के कार्यपालक निदेशक मनोज कुमार ने गुरूवार को आयोजित वेबिनार के दौरान कही. इस वेबिनार में सिविल सर्जन, डीपीएम, डीपीसी समेत अन्य स्वास्थ्य कर्मी भी शामिल थे.

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‘सांस’ कार्यक्रम बच्चों को निमोनिया से दिलाएगी राहत

कार्यपालक निदेशक मनोज कुमार ने बताया कि निमोनिया के कारण बच्चों में होने वाली मौतों को सरकार ने गंभीरता से लिया है. इसको लेकर केंद्र सरकार द्वारा सांस( सोशल अवेयरनेस एंड एक्शन टू न्यूट्रीलाइज निमोनिया सक्सेसफुली) कार्यक्रम की शुरुआत की गयी है. इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य निमोनिया के दंश से बच्चों को सुरक्षित करना है. बिहार के 2 जिलों में इसकी शुरुआत हो चुकी है एवं आने वाले समय में अन्य जिलों में भी इसका क्रियान्वयन किया जायेगा.

पांच साल से कम उम्र के बच्चों में 14 से 15% मौतें निमोनिया के कारण

राज्य कार्यक्रम पदाधिकारी बाल स्वास्थ्य डॉ. वीपी राय ने बताया कि यदि बिहार में शिशु मृत्यु दर एवं नवजात मृत्यु दर की बात की जाए तो पिछले कुछ वर्षों में इसमें कमी भी आई है। सैंपल रजिस्ट्रेशन सर्वे के मुताबिक बिहार की शिशु मृत्यु दर 3 अंक घटकर राष्ट्रीय औसतके बराबर हो गयी है। वर्ष 2017 में बिहार की शिशु मृत्यु दर 35 थी, जो वर्ष 2018 में घटकर 32 हो गयी। बिहार की नवजात मृत्यु दर पिछले 7 वर्षों से 27-28 के बीच लगभग स्थिर थी। लेकिन वर्ष 2018 में 3 पॉइंट की कमी आई है. बिहार की नवजात मृत्यु दर जो वर्ष 2017 में 28 थी, वर्ष 2018 में घटकर 25 हो गयी। यह एक सकारात्मक संकेत हैं. पांच साल से कम आयु के बच्चों में 14 से 15% मौतें सिर्फ़ निमोनिया के कारण हो जाती है. इसलिए निमोनिया प्रबंधन पर ध्यान देना काफी जरुरी है. इसके लिए प्रोटेक्ट, प्रिवेंट एवं ट्रीट मोड पर अधिक बल देने की जरूरत है. निमोनिया से बचाव के लिए पीसीवी का टीका निमोनिया से बच्चों को प्रिवेंट कर सकते हैं. वहीँ हाउस होल्ड स्तर पर वायु प्रदूषण में कमी लाकर निमोनिया को प्रिवेंट किया जा सकता है. साथ ही एंटीबायोटिक एवं ऑक्सीजन थेरेपी से निमोनिया को ट्रीट किया जा सकता है.

वर्ष 2025 तक निमोनिया के कारण होने वाली मौतों में कमी लाने का लक्ष्य

यूनिसेफ के हेल्थ स्पेशलिस्ट डॉ. सैय्यद हुबेअली ने बताया कि पांच साल से कम उम्र के बच्चों के लिए निमोनिया गंभीर रोगों में शामिल है. आईएपीपीडी( इन्डियन एसोसिएशन ऑफ़ पार्लियामेंटेरियनस ऑन पापुलेशन एंड डेवलपमेंट) ने वर्ष 2025 तक 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में निमोनिया से होने वाली मृत्यु दर को प्रति 1000 जीवित जन्म 3 से भी कम करने का लक्ष्य निर्धारित किया है. वहीं वर्ष 2010 की तुलना में वर्ष 2025 तक निमोनिया की गंभीरता में 75% कमी लाने का लक्ष्य निर्धारित किया है. उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य एवं पोषण दोनों बच्चे को निमोनिया से सुरक्षित रखने में भूमिका निभाते हैं. निमोनियाका टीका(पीसीवी) एवं नवजात संक्रमण प्रबंधन के द्वारा 30% बच्चों की जान बचायी जा सकती है. वहीं स्तनपान, निमोनिया का उचित उपचार एवं स्वच्छ पेय जल के माध्यम से 36% शिशुओं को सुरक्षित किया जा सकता है. इस दौरान एनएमसीएच पटना के शिशु रोग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अखिलेश कुमार ने निमोनिया के प्रकार, उपचार एवं पहचान पर विस्तार से जानकारी दी.

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