कोरोना संकटकाल में भी कुपोषण के खिलाफ जंग लड़ रही है आशा पिंकी, बच्चों को सुपोषित करने में दे रही अहम योगदान

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  • प्रत्येक वर्ष 35 से 40 बच्चों को कराती हैं कुपोषण से मुक्त
  • गांव में चाची के नाम से महशूर है आशा पिंकी देवी

छपरा : वैश्विक महामारी कोरोना वायरस के खिलाफ हर कोई जंग लड़ रहा है। डॉक्टर नर्स, पुलिस मीडियाकर्मी, आंगनबाड़ी सेविका और आशा कार्यकर्ता इस जंग में अपने कर्तव्यों का बखूबी निर्वहन कर रहे हैं. कोरोना संकटकाल में भी गांव की आशा पिंकी देवी कुपोषण के खिलाफ जंग लड़ रही है। एक दशक से बच्चों को कुपोषण से मुक्त कराने के लिए निरंतर सक्रिय रूप से पिंकी देवी कार्य कर रही हैं। प्रत्येक वर्ष 35 से 40 बच्चों को कुपोषण से मुक्त कराने के लिए पोषण केंद्र में ले जाकर भर्ती कराने से लेकर घर-घर जाकर पोषण की अलख जगाना पिंकी को अन्य कार्यकर्ताओं से अलग करता है। आशा कार्यकर्ता पिंकी देवी का मुख्य रूप से गर्भवती महिलाओं की देखभाल व संस्थागत प्रसव कराने के दायित्व के साथ कुपोषित बच्चों की पहचान कर उन्हें पोषण पुनर्वास केंद्र में ले जाकर भर्ती भी कराती हैं। वह लगातार अपने पोषक क्षेत्र के बच्चों का ख्याल रखती हैं।

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कोरोना वायरस से बचाव की दे रही जानकारी

आशा पिंकी देवी नियमित क्षेत्र भ्रमण कर लोगों को कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव के लिए जागरूक कर रहीं है।लोगों को सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क का उपयोग, नियमित हाथों की धुलाई, आस-पास सफाई करने के लिए प्रेरित कर रही हैं। साथ हीं साथ कुपोषित बच्चों का भी विशेष देखभाल कर रही हैं।

गांव में गूंज रही बच्चों की किलकारी 

वर्ष 2019 में पिंकी देवी ने 35 बच्चों को पोषण केंद्र में भर्ती कराया और पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद आज उन बच्चों की किलकारी गूंज रही है। जिले के बनियापुर प्रखंड के पिपरपाती गांव की रहने वाली पिंकी का कहना है, “कुपोषण मुक्त भारत बनाने के लिए सरकार की ओर से कई योजनाएं चलाई जा रही है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में रहने लोगों को इसकी जानकारी नहीं होती है, जिसके कारण कुपोषण के शिकार अपने बच्चों का इलाज व पोषण का उपाय नहीं कर पाते हैं। आज के नौनिहाल ही कल के हमारे भविष्य हैं और स्वस्थ समाज के लिए नौनिहालों का स्वस्थ होना जरूरी है”.

“बच्चों की चाची” के नाम से है मशहूर

पिंकी कहती हैं , जब भी इलाके में गर्भवती महिलाओं की देखभाल के लिए जाती हैं तो, उन परिवार के प्रत्येक बच्चे के स्वास्थ्य की भी जानकारी लेती हैं और जिन बच्चों में कुपोषण के लक्षण दिखता है, उन्हें बिना देर किए परिवार के सदस्यों के साथ पोषण केंद्र पर लेकर पहुंचती हैं। सावित्री के इस काम के कारण इलाके के लोग उन्हें “बच्चों की चाची” के नाम से भी जानते हैं और अधिकांश बच्चे उन्हें चाची कहकर ही बुलाते हैं । हर घर के बच्चों में वह लोकप्रिय हैं।

बदल चुकी है गांव की तस्वीर

बनियापुर प्रखंड के पिपरपांती गांव में शायद ही कोई ऐसा घर होगा जिस घर में कोई बच्चा आज कुपोषण का शिकार मिले । उस गांव के सभी बच्चे कुपोषण मुक्त हो चुके हैं। पिंकी बताती हैं कि जब गांव के बच्चों को स्वस्थ व तंदुरुस्त स्थिति में उछलते – कूदते देखती है तो, मन प्रफुल्लित हो उठता है और इस काम में उन्हें अलग से कुछ नहीं करना होता है। अपने काम के साथ-साथ गांव को स्वस्थ बनाने के लिए ध्यान देना होता है, जिससे यह काम भी बड़ी आसानी से हो जाता है।

गांव के लोगों में भी आयी जागरूकता

पिंकी ने बताया वह करीब एक दशक से गांव में आशा का काम कर रही है। अब गांव के लोग भी जागरूक हो चुके हैं। एक दशक पहले तक कोई भी अपने बच्चे को पोषण केंद्र लेकर नहीं जाता था। कुपोषण के शिकार होने के कारण बच्चों का समुचित विकास नहीं हो पाता है, जिसको लेकर पूरे परिवार के लोग परेशानी में रहते हैं , जब वह पहले इस स्थिति को देखती थी तो, काफी विचलित हो जाती थी।

ऐसे शुरू हुआ सिलसिला

पिंकी देवी को आशा कार्यकर्ता के रूप में काम करते हुए उन्हें पता चला कि सदर अस्पताल में पोषण केंद्र भी खुला है, जहां कुपोषण के शिकार बच्चों को भर्ती कर पोषित किया जाता है और उनके बेहतर स्वास्थ्य के लिए आवश्यक उपाय किए जाते हैं । पहले उन्होंने पोषण केंद्र में जाकर उसकी कार्यप्रणाली और बच्चों के भर्ती कराने की प्रक्रिया के बारे में जानकारी ली और उसके बाद सिलसिला चल पड़ा, जो लगातार जारी है ।